बंगाल मे Detect, Delete, Deport हकीमपुर बॉर्डर पर उमड़ी भीड़ , हजारों घुसपैठिया खुद भाग रहे वापस ।

 

सुभेन्दु अधिकारी सरकार की सख्त नीति के बाद बंगलादेशी घुसपैठियों में दहशत, मालदा - मुर्शिदाबाद मे होल्डिंग सेंटर ऐक्टिव -- फर्जी पासपोर्ट , आधार कार्ड समेत सिंडीकेट बेनकाब 

क्या हो रहा है बंगाल मे  

वेस्ट बंगाल मे नई बीजेपी सरकार के सत्ता मे आते ही घुसपैठिया के खिलाफ अभियान शुरू हुआ , उसका असर अब जमीन पर साफ दिखने लगा है । मुख्यमंत्री सुभेन्दु अधिकारी की 'Detect, Delete and Deport' नीति के तहत राज्य के गृह विभाग के फॉरेनर्स ब्रांच ने सभी जिला प्रशासनों को सख्त निर्देश जारी किए हैं। इसके जवाब में बांग्लादेशी घुसपैठियों में भारी घबराहट देखने को मिल रही है। कोलकाता और आसपास के इलाकों जैसे दमदम, न्यू टाउन और डानकुनी में सालों से मजदूर और घरेलू कामगारों के रूप में रह रहे सैकड़ों संदिग्ध अचानक काम छोड़कर हकीमपुर बॉर्डर की ओर रवाना हो गए हैं।

आधिकारिक पुष्टि: अधिकारियों ने पुष्टि की है कि लोग स्वेच्छा से देश छोड़ रहे हैं क्योंकि अब वे दस्तावेजों की कड़ी जांच में अपनी फर्जी नागरिकता साबित नहीं कर सकते।

कौन हैं ये घुसपैठिए?

पकड़े गए कई संदिग्धों ने कैमरे पर स्वीकार किया कि वे बांग्लादेश के राजशाही और चपाई नवाबगंज जिलों के मूल निवासी हैं। ये लोग दलालों के सिंडिकेट के जरिए फर्जी दस्तावेज बनवाकर और शादियां करके यहां बस चुके थे। इनके पास से फर्जी भारतीय पासपोर्ट, नकली EPIC वोटर आईडी कार्ड और जाली आधार कार्ड तक बरामद हुए हैं। मालदा और मुर्शिदाबाद होल्डिंग सेंटर में शुरुआती 48 घंटों में ही ऐसे कई संदिग्ध पकड़े गए जो सालों से भारत में रहते आ रहे थे।

कहां हो रही है यह कार्रवाई?

कार्रवाई का केंद्र नॉर्थ 24 परगना का हकीमपुर चेकपोस्ट है, जहां से सबसे ज्यादा लोग लौट रहे हैं। मालदा जिले के इंग्लिश बाजार के चंदन पार्क में राज्य का पहला आधिकारिक होल्डिंग सेंटर एक्टिव किया जा चुका है। मुर्शिदाबाद के लालगोला में पद्मा भवन को अस्थाई सेंटर बनाया गया है। सिलीगुड़ी-माटीगाड़ा-नक्सलबाड़ी क्षेत्र में एक और केंद्र निर्माणाधीन है।

यह सब कब से शुरू हुआ?

नवंबर 2025 में SIR (Special Intensive Revision) प्रक्रिया के दौरान जैसे ही दस्तावेजों की गहन जांच शुरू हुई, बॉर्डर इलाकों में पहली बड़ी हलचल देखने को मिली थी। मई 2026 में जैसे ही राज्य सरकार ने हर जिले में होल्डिंग सेंटर बनाने की घोषणा की, दोबारा बड़ी संख्या में लोग वापसी की राह पकड़ने लगे। केंद्रीय गृह मंत्रालय की गाइडलाइंस के अनुसार होल्डिंग सेंटर में अधिकतम 30 दिनों तक रखकर दस्तावेजों की जांच की जाएगी।


इन्हें बसाया कैसे गया था?

यह महज व्यक्तिगत प्रयास नहीं, बल्कि एक संगठित आर्थिक तंत्र था। सीमा पार कराने वाले दलाल एक पूरे पैकेज के तहत काम करते थे — बॉर्डर क्रॉस कराने से लेकर दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु जैसे महानगरों में रोजगार दिलाने तक। शुरुआत में पंचायत या नगर पालिका से फर्जी जन्म प्रमाणपत्र बनवाए जाते थे, फिर राशन कार्ड, और उसके बाद आधार व वोटर आईडी। विशेषज्ञों का कहना है कि स्थानीय राजनीतिक संरक्षण के बिना इतने बड़े पैमाने पर यह संभव नहीं था।

"हम इन्हें जेल में नहीं रखना चाहते ताकि ये देश के पैसे पर खाना खाएं और दवाइयां लें। ये देश के दामाद नहीं हैं — जल्दी भेजो।"  — शुभेंदु अधिकारी, मुख्यमंत्री, पश्चिम बंगाल

आगे क्या है सरकार का प्लान? 

विशेषज्ञों का मानना है कि घुसपैठ को 100% रोकना किसी भी देश के लिए चुनौतीपूर्ण है — अमेरिका भी मेक्सिको सीमा पर पूरी तरह सफल नहीं हुआ। लेकिन सरकार की प्राथमिकता अब यह है कि पकड़े गए संदिग्धों को सीधे BSF के हवाले किया जाए और डिपोर्टेशन की प्रक्रिया तेज की जाए। साथ ही उन TMC नेताओं पर भी कार्रवाई जारी है जिन्होंने इन्हें बसाने में भूमिका निभाई। भारत-बांग्लादेश सीमा की फेंसिंग का काम भी तेज किया जा रहा है। यह लड़ाई लंबी है — लेकिन दिशा साफ है।

"अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों की जगह केवल होल्डिंग सेंटर में है। कुछ भाग गए, कुछ वापस भेजे गए, कुछ छुपे हैं — हम सबको ढूंढेंगे।"

— खगेन मुर्मू, भाजपा सांसद






 

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